दास्तान

कारगर मानूँ अगर फिर दे सकूं इक इंतिहांनर्म रेतों पर लिखूँ अपने सफर की दास्ताँ। चंद किस्से जिंदगी के भूलना मुश्किल बड़ाछोड़ पीछे याद चल फिर से सजाएँ कारवां। याद भी है लफ्ज़ भी हैं पर लहर कमबख्त हैले बहा जाती लिखा हर बार मेरी दास्तान। दर बदर फिरता मुसाफिर ढूंढता कुछ पल सुकूंपर नहींपढ़ना जारी रखें “दास्तान”

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