ख्वाहिशों के पर नए

वो कौन था पता नहीं, जो रोज इत्तेफाक से।
सामने खड़ा मिला, मुस्कुरा मजार पे।।1।।

नहीं पता! थी क्या वजह, जुड़ गए थे इस कदर।
ये ‘लब’ कभी खुले नहीं, वो मिल गए मुझे मगर।।2।।

मिला सुकूं, ठहर गए, थी रागिनी निकल गई।
दिखा कमर, मचल गए, थी चांदनी जवां हुई।।3।।

रह गया जो ख्वाब में, ख़याल बन के आ गया।
वजह मुझे पता नहीं, अश्क़ था, छलक गया।।4।।

इक याद थी जवां हुई, दो बूंद थी लुढ़क गयी।
रात थी जो ढल गई, जज़्बात थे जो बह गए।।5।।

कुछ ख्वाहिशों के पर नए, फिर से उगेंगे पीठ पर।
ये सोचता चला गया, ‘निशां’ यहीँ पे छोड़कर।।6।।

‘कुमार मानवेन्द्र’©®

अनायास ही
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