दीप जल मेरे निरंतर…

यूँ दीप जल मेरे निरंतर, तमस का संहार हो,लौ जला आगे बढ़ा जिस पथ से भी प्रतिकार हो। तू ही नयन की आस बन, उम्मीद की किरणें दिखा,तू ही प्रबल विश्वास बन, कीर्ति भूषित रथ सजा। तू बन खड़ा हो सारथी, जिस पल अगम जीवन लगे,सबको प्रकाशित पथ दिखा, जब सत्य भी डिगता दिखे। तूपढ़ना जारी रखें “दीप जल मेरे निरंतर…”

प्रणय बंधन

यह मिलन कैसा प्रिये, जिसमें नहीं हम साथ इकपल,दूर तुम और दूर मैं, कैसे निभे ये प्रणय* बंधन।हर घड़ी में याद तेरी, सह रहा अवसाद* तन-मन,कुछ मिलन की आस बाकी, हो रहा निष्प्राण जीवन।   कैसे मिटाऊँ दूरियों को, इस जुगत में मैं प्रतिक्षण,  पास आने को प्रिये, कर रहा हूँ मैं समीरण*। 2.दूर तुम रहते प्रिये,पढ़ना जारी रखें “प्रणय बंधन”

जनता कर्फ्यू के उद्देश्य को समझें। जनहित में अपना सहयोग खुद को घर की चारदीवारी तक सीमित कर प्रदर्शित करें।🙏

निर्जन पड़ी धरती दिखी,वीरान सब मंजिल दिखी।शांत सब कलरव हुआ,आप्त जन जीवन हुआ।क्या हुआ जो सो गए?जाने कहाँ सब खो गए! एक शक्ति पारावार हैविज्ञान का अवतार है।संचार पा पातक बनीऔर लीलने जीवन लगी।निज के जने का वार हैइंसान अब लाचार है।जीना हुआ दुसवार हैजीवन हुआ बेजार है। बचाव ही उपचार है,संयम ही बस आधारपढ़ना जारी रखें “जनता कर्फ्यू के उद्देश्य को समझें। जनहित में अपना सहयोग खुद को घर की चारदीवारी तक सीमित कर प्रदर्शित करें।🙏”

दास्तान

कारगर मानूँ अगर फिर दे सकूं इक इंतिहांनर्म रेतों पर लिखूँ अपने सफर की दास्ताँ। चंद किस्से जिंदगी के भूलना मुश्किल बड़ाछोड़ पीछे याद चल फिर से सजाएँ कारवां। याद भी है लफ्ज़ भी हैं पर लहर कमबख्त हैले बहा जाती लिखा हर बार मेरी दास्तान। दर बदर फिरता मुसाफिर ढूंढता कुछ पल सुकूंपर नहींपढ़ना जारी रखें “दास्तान”

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर त्याग एवं समर्पण की प्रतिमूर्ति सभी माताओं एवं बहनों को सप्रेम समर्पित “सजल नेत्रों से जलधारा बही”

आंचलों के कोर से, अश्रु छुपाती,टेक लकुटी कुछ कदम संग वो बढ़ाती।सींचती जाती धरा को नेत्रजल से,दे रही वरदान झोली भर हृदय से। पुत्र था, कुछ पल रुका, मुड़ कर निहारा,मातु अबला! अब उसे किसका सहारा? थाम हाथों को रुका, छवि हड़बड़ाई,अश्रुधारा बह चली, ‘मां’ मुस्कुरायी।सोच मत, मेरे नयन में, कुछ पड़ा है,आंसुओं की धारपढ़ना जारी रखें “अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर त्याग एवं समर्पण की प्रतिमूर्ति सभी माताओं एवं बहनों को सप्रेम समर्पित “सजल नेत्रों से जलधारा बही””

वो मुझे नहीं सुननेवाले

मैं क्यूँ जाऊं उधर, जिधर कुछ बात नहीं बनने वाली।प्रेम जगाने वाले कवि को, ‘वाह’ नहीं मिलने वाली।।1।। सुन मेरे मन, मैं उदास, अब आस नहीं जगने वाली।भले लिखें हों, शब्द निराले, साज नहीं मिलने वाली।।2।। कुछ अवसाद हृदय के उनको, छोड़ नहीं जानेवाले।तन पवित्र पर मन मलिन, ‘वो’ बात नहीं सुनने वाले।।3।। कुछ कठोरपढ़ना जारी रखें “वो मुझे नहीं सुननेवाले”

‘ख्वाहिशों के पर’

वो कौन था पता नहीं, जो रोज इत्तेफाक से।सामने खड़ा मिला, मुस्कुरा मजार पे।।1।। नहीं पता! थी क्या वजह, जुड़ गए थे इस कदर।ये ‘लब’ कभी खुले नहीं, वो मिल गए मुझे मगर।।2।। मिला सुकूं, ठहर गए, थी रागिनी निकल गई।दिखा कमर, मचल गए, थी चांदनी जवां हुई।।3।। रह गया जो ख्वाब में, ख़याल बनपढ़ना जारी रखें “‘ख्वाहिशों के पर’”

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