दीप जल मेरे निरंतर…

यूँ दीप जल मेरे निरंतर, तमस का संहार हो,
लौ जला आगे बढ़ा जिस पथ से भी प्रतिकार हो।

तू ही नयन की आस बन, उम्मीद की किरणें दिखा,
तू ही प्रबल विश्वास बन, कीर्ति भूषित रथ सजा।

तू बन खड़ा हो सारथी, जिस पल अगम जीवन लगे,
सबको प्रकाशित पथ दिखा, जब सत्य भी डिगता दिखे।

तू रश्मियों का रूप धर, नव उषा का संचार कर,
अविराम तू ये रथ बढ़ा, चाहे पथिक थकता दिखे।

ज्योति तू ऐसी जला, अनल बन शोणित जले,
तड़ित बनकर तू चमक, जब तिमिर की माया दिखे।

तू ही अभय वरदान बन, हर शाप का मोचन करा,
पतवार बन मंझधार में, यात्रा सुलभ सबकी बना।

सारे पथिक अनुचर तेरे, तुझसे ही संबल ले बढ़े,
निर्बाध जल दीपक मेरे, तेरे ही बल पर सब खड़े।

ऐ आंधियां पवमान सुन, ऐ प्रबल झंझावात सुन,
दारुण दनुज सब गात्र सुन, ऐ सृष्टियाँ नवराग सुन।

मेरा वरण अभिजात्य सुन, हठयोग का अनुराग सुन,
सबमें समाहित प्राण सुन, मेरा अलौकिक राग सुन।

जो जल रहा-दीपक यहां उसमें बहा शोणित मेरा,
उस लहू की पुकार सुन, नेपथ्य की आवाज़ सुन।

सज चुका आकाश है, न बुझ सके, वो प्रकाश है,
आ रहा नवप्रभात है, मेरा अटल विश्वास है-2।

©®
Kumar Manvendra

प्रणय बंधन

यह मिलन कैसा प्रिये, जिसमें नहीं हम साथ इकपल,
दूर तुम और दूर मैं, कैसे निभे ये प्रणय* बंधन।
हर घड़ी में याद तेरी, सह रहा अवसाद* तन-मन,
कुछ मिलन की आस बाकी, हो रहा निष्प्राण जीवन।

  कैसे मिटाऊँ दूरियों को, इस जुगत में मैं प्रतिक्षण,
  पास आने को प्रिये, कर रहा हूँ मैं समीरण*।

2.
दूर तुम रहते प्रिये, मैं भी तड़पती क्षण-प्रतिक्षण,
कुछ सुहाने ख्वाब दिल के, कर रहे दुश्वार* जीवन।
पाट दूँ मैं दूरियों को, नित्य नई मजबूरियों को,
साथ तेरे रह सकूं, त्याग जग की रूढ़ियों* को।

तितलियों के रंग धरकर, इन खगों* से पंख लेकर,
   लौट आऊं पास प्रियवर, बस हृदय में यह निरंतर।

3.
शायद नियति* ने चुन रखा है, भाग्य ने कुछ बुन रखा है
बीच अपने कुछ अनंतर, दूरियों को भर रखा है।
पर हृदय में आस रखना, प्रेम में विश्वास रखना
रोशनी बन आ मिलूँगी, मीत करने पूर्ण जीवन।

है मुझे विश्वास खुदपर, दूरियों को मात देकर
मेघ* बनकर आ सकूँगी, प्रिय निभाने प्रणय बंधन।

कुमार मानवेन्द्र

जनता कर्फ्यू के उद्देश्य को समझें। जनहित में अपना सहयोग खुद को घर की चारदीवारी तक सीमित कर प्रदर्शित करें।🙏

निर्जन पड़ी धरती दिखी,
वीरान सब मंजिल दिखी।
शांत सब कलरव हुआ,
आप्त जन जीवन हुआ।
क्या हुआ जो सो गए?
जाने कहाँ सब खो गए!

एक शक्ति पारावार है
विज्ञान का अवतार है।
संचार पा पातक बनी
और लीलने जीवन लगी।
निज के जने का वार है
इंसान अब लाचार है।
जीना हुआ दुसवार है
जीवन हुआ बेजार है।

बचाव ही उपचार है,
संयम ही बस आधार है,
संसार का सुविचार है।

पर है मनुज कपटी बड़ा,
निज स्वार्थ के पीछे चला।
चुपचाप खुद में कुछ छुपा,
अपनी हया को लांघता,
घूमता दम तोड़ता,
सब दूसरों पर थोपता।
यूँ फैलता दुश्मन रहा,
हर शहर में झांकता,
अपनी परिधि विस्तारता।

देखो बड़ी दुर्लभ समय,
यह हर नियति को नापता।
कुछ तथ्य बिखरे हैं पड़े,
कुछ सत्य सार्थक हैं दिखे।
अब भी समय है जान लो,
भविष्य को पहचान लो।
परहेज से जीवन बचे तो,
बात छोटी मान लो।

इसमें नहीं संशय कोई,
थोड़ी समस्या आएगी।
आंखों में आंसू लाएगी।
पर निवारण है यही,
एक गांठ ऐसी बांध लो।

कुछ दिनों घर में रहो,
हाथ मुँह धोते रहो,
कार्य सब करते रहो।
शक यदि कुछ हो प्रबल तो,
दूसरों से दूर हो,
शांत बन बैठे रहो।
ताकि समस्या पार हो।।
आम जन जीवन बने,
समाज का कल्याण हो,
निजधर्म पर अभिमान हो।
और राष्ट्र का सम्मान हो।

🙏🙏
Kumar Manvendra

दास्तान

कारगर मानूँ अगर फिर दे सकूं इक इंतिहां
नर्म रेतों पर लिखूँ अपने सफर की दास्ताँ।

चंद किस्से जिंदगी के भूलना मुश्किल बड़ा
छोड़ पीछे याद चल फिर से सजाएँ कारवां।

याद भी है लफ्ज़ भी हैं पर लहर कमबख्त है
ले बहा जाती लिखा हर बार मेरी दास्तान।

दर बदर फिरता मुसाफिर ढूंढता कुछ पल सुकूं
पर नहीं सुनता ख़ुदा नाचीज़ की इक इल्तिज़ा।

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर त्याग एवं समर्पण की प्रतिमूर्ति सभी माताओं एवं बहनों को सप्रेम समर्पित “सजल नेत्रों से जलधारा बही”

आंचलों के कोर से, अश्रु छुपाती,
टेक लकुटी कुछ कदम संग वो बढ़ाती।
सींचती जाती धरा को नेत्रजल से,
दे रही वरदान झोली भर हृदय से।

पुत्र था, कुछ पल रुका, मुड़ कर निहारा,
मातु अबला! अब उसे किसका सहारा?

थाम हाथों को रुका, छवि हड़बड़ाई,
अश्रुधारा बह चली, ‘मां’ मुस्कुरायी।
सोच मत, मेरे नयन में, कुछ पड़ा है,
आंसुओं की धार का कारण बना है।

वृद्ध मां ने अंक भर, उसको सराहा।
चूम माथा प्रेम से उसको दुलारा।।

जीवन मरण तो सृष्टि का एक अटल क्षण है,
उसका वरण हर मनुज का अंतिम चरण है।

पुत्र तू चिंता न कर, जीवन सुलभ है,
धर्म ने बांधा मुझे, प्रभु की शरण है।
कर्म कर, मेरे भरण को सोच मत तू,
निश्चिंत हो इस नवल पथ पर पग बढ़ा तू।

पुत्र पथ पर बढ़ चला, आशीष लेकर,
सिसकती अपनी जननि को टीस देकर।


“लौटने की आस धार कर, माँ दुआरे से चली।
स्नेह उमड़ा, सजल नेत्रों से जलधारा बही।”

©® By- kumar manvendra

विश्व महिला दिवस पर विश्व की सभी महिलाओं को नमन

वो मुझे नहीं सुननेवाले

मैं क्यूँ जाऊं उधर, जिधर कुछ बात नहीं बनने वाली।
प्रेम जगाने वाले कवि को, ‘वाह’ नहीं मिलने वाली।।1।।

सुन मेरे मन, मैं उदास, अब आस नहीं जगने वाली।
भले लिखें हों, शब्द निराले, साज नहीं मिलने वाली।।2।।

कुछ अवसाद हृदय के उनको, छोड़ नहीं जानेवाले।
तन पवित्र पर मन मलिन, ‘वो’ बात नहीं सुनने वाले।।3।।

कुछ कठोर वाणी हो शायद, अर्थ नहीं ‘ताने’ वाले।
मृदुल नहीं कुछ कटु सत्य को, शेष नहीं सुनने वाले।।4।।

मैं निष्ठुर शायद सुनने से, डरते हों जलसे वाले।
कुछ अनहोनी से बचने को, मुझे कोसते मद वाले।।5।।

मैं ‘मुक्तक’ और ‘छंद’ लिखूं, ना सुनें मुझे दुनियावाले।
कटु सत्य उद्धृत करने से, ना रुकें हाथ लिखनेवाले।।6।।

अखिल विश्व मेरी वाणी को, इकदिन अवश्य दुहरायेगा।
मैं ‘देखूँ’ या ना ‘देखूं’, सब ‘समयचक्र’ बतलायेगा।।7।।

मैं सार्थक सब गीत लिखूं, दिख जाएँ ‘समय’ आनेवाले।
शायद मेरी यही परीक्षा, चल जाएं भले सुनने वाले।।8।।

‘ख्वाहिशों के पर’

अनायास ही

वो कौन था पता नहीं, जो रोज इत्तेफाक से।
सामने खड़ा मिला, मुस्कुरा मजार पे।।1।।

नहीं पता! थी क्या वजह, जुड़ गए थे इस कदर।
ये ‘लब’ कभी खुले नहीं, वो मिल गए मुझे मगर।।2।।

मिला सुकूं, ठहर गए, थी रागिनी निकल गई।
दिखा कमर, मचल गए, थी चांदनी जवां हुई।।3।।

रह गया जो ख्वाब में, ख़याल बन के आ गया।
वजह मुझे पता नहीं, अश्क़ था, छलक गया।।4।।

इक याद थी जवां हुई, दो बूंद थी लुढ़क गयी।
रात थी जो ढल गई, जज़्बात थे जो बह गए।।5।।

कुछ ख्वाहिशों के पर नए, फिर से उगेंगे पीठ पर।
ये सोचता चला गया, ‘निशां’ यहीँ पे छोड़कर।।6।।

‘कुमार मानवेन्द्र’

मंथन

हरित साखों पर पल्लवित,चेतना मैं।
अंतःकरण की शून्यता को चीरता मैं।
प्रस्फुटित नवजात, नभ को देखता हूँ।
नवल पंखों को खगों सा खोलता हूँ।

नवसृजन की कल्पना में मत्त हम थे।
सृष्टि की आभा अलौकिक मुग्ध हम थे।
निज बदन पर झेल तुमने कष्ट सारे,
दे दिया जीवन मुझे खुद बन अभागे।

वृन्त पर तेरे खड़ा में मुस्कुराता,
मंद बहता समीर मुझको लड़खड़ाता।
परम जीवन अटल सत्यों को समर्पित।
नव उषा की आस में मैं गीत गाता।

बीते प्रहर, रवि की किरण का आगमन हो।
कोमल बदन का नियति से अब सामना हो।
मैं अकिंचित हूँ खड़ा, रण में अकेला।
अटल सत्यों से भले, भीषण समर हो।

जो किये उपकार तुमने, भूल जाऊं मैं!
कर समर्पण, सृष्टि से अब हार जाऊं मैं!
या कर वरण, इस प्रभा से रण जीत जाऊं मैं!
इन विचारों को संजोए निज हृदय में,
कर रहा हूँ द्वंद इस निर्मम जगत में।

©®

-कुमार मानवेन्द्र

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